Sanskrit Subhashitas 129

Sanskritगते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् । वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥ Hindiबीते हुए समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य के लिए

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Sanskrit Subhashitas 20

20. सेवाधर्म मौनान्मूक: प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वा धृष्ट: पाश्र्वे वसति च तदा दूरतश्चाप्रगल्भ:।क्षान्त्याभीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजात: सेवाधर्म: परमगौनो योगिनामप्यगम्य:॥ The path of service is formidable.

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Sanskrit Subhashitas 36

36. सज्जना अपां निधिं वारिभिरर्चयन्ति दोषेन सूर्यं प्रतिबोधयन्ति।ताभ्यां तयो: किं परिपूर्णता स्याद् भक्त्या हि तुष्यन्ति महानुभावा:॥ People worship the lord of waters (ocean) by offering

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Sanskrit Subhashitas 167

Sanskritश्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसा:।वाग्यता: शुचयश्चैव श्रोतार: पुण्यशालिन:॥ Hindiश्रद्धा और भक्ति से समान रूप से युक्त, अन्य कार्यों की इच्छा न रखने वाले, कम और सुन्दर

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Sanskrit Subhashitas 150

Sanskritकश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपु:।अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा॥ Hindiन कोई किसी का मित्र है और न शत्रु, कार्यवश ही लोग मित्र और शत्रु

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Sanskrit Subhashitas 117

Sanskritसत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥ Hindiसत्य बोलें, प्रिय बोलें पर अप्रिय सत्य न बोलें और प्रिय

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Sanskrit Subhashitas 100

100. दरिद्रता कष्टा वृत्ति: पराधीना कष्टो वासो निराश्रय:।निर्धनो व्यवसायश्च सर्वकष्टा दरिद्रता॥ Service for livelihood in dependence is difficult. Living somehow without a support is difficult.

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