Sanskrit Subhashitas 133

Sanskritदर्शने स्पर्शणे वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा।यत्र द्रवत्यन्तरङ्गं स स्नेह इति कथ्यते॥ Hindiयदि किसी को देखने से या स्पर्श करने से, सुनने से या बात

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Sanskrit Subhashitas 8

8. एकं हन्यान्न हन्याद्वा शरो मुक्तो धनुष्मता।     बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्रं सराजकम्॥  ekaM hanyAnna hanyAdvA sharo mukto dhanuShmatA| buddhirbuddhimatotsRuShTA hanyAdrAShTraM sarAjakam|| Meaning:-Arrow released by archer may

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Sanskrit Subhashitas 24

24. लाभ को लाभो गुणिसंगम: किमसुखं प्राज्ञेतरै: संगति: का हानि: समयच्युतिर्निपुणता का धर्मतत्त्वे रति:।क: शूरो विजितेन्द्रिय: प्रियतमा कानुव्रता किं धनं विद्या किं सुखमप्रवासगमनं राज्यं किमाज्ञाफलम्॥

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Sanskrit Subhashitas 56

56. सुखम् सुखं हि दु:खान्यनुभूय शोभते घनान्धकारेष्विव दीपदर्शनम्।सुखात्तु यो याति नरो दरिद्रतां धृत: शरीरेण मृत: स जीवति॥ Happiness indeed shines up, after having experienced

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Sanskrit Subhashitas 162

Sanskritअकॄत्यं नैव कर्तव्य प्राणत्यागेऽपि संस्थिते।न च कॄत्यं परित्याज्यम् एष धर्म: सनातन:॥ Hindiन करने योग्य कार्य को प्राण जाने की परिस्थिति में भी नहीं करना

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Sanskrit Subhashitas 113

Sanskritन चोराहार्यम् न च राजहार्यम्, न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि। व्यये कृते वर्धत एव नित्यं, विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥ Hindiजिसे न चोर चुरा सकते हैं, न

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