Sanskrit Subhashitas 139

Sanskritअतितॄष्णा न कर्तव्या तॄष्णां नैव परित्यजेत्।शनै: शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम् ॥ Hindiअधिक इच्छाएं नहीं करनी चाहिए पर इच्छाओं का सर्वथा त्याग भी नहीं करना

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Sanskrit Subhashitas 14

14. विद्या      विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं      विद्या भोगकरी यश:सुखकरी विद्या गुरूणां गुरु:।      विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या

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Sanskrit Subhashitas 173

Sanskritन अन्नोदकसमं दानं न तिथि द्वादशीसमा।न गायत्र्याः परो मन्त्रो न मातु: परदैवतम्॥ Hindiअन्न और जल के समान दान नहीं है, द्वादशी से समान तिथि

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Sanskrit Subhashitas 156

Sanskritदुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम्।मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरूषसंश्रय:॥ Hindiयह तीन दुर्लभ हैं और देवताओं की कृपा से ही मिलते हैं – मनुष्य जन्म, मोक्ष की इच्छा और

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Sanskrit Subhashitas 123

Sanskritआयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न न लभ्यते।नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥ Hindiआयु का एक क्षण भी सारे रत्नों को देने से प्राप्त नहीं

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Sanskrit Subhashitas 106

106. गुरु अवद्यमुक्ते पथि य: प्रवर्तते प्रवर्तत्यन्यजनं च नि:स्पृह:।स सेवितव्य: स्वहितैषिणा गुरु: स्वयं तरैस्तारयितुं क्षम परम्॥ The preceptor (guru) should be resorted to, by a

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